डेली न्यूज़ टाइम्स... ( जिया उल्ला खान )....
बिलासपुर.... लिंगियाडीह में चल रहा ‘बचाओ धरना आंदोलन’ बुधवार को 97वें दिन में प्रवेश कर गया और अब 100 दिन की ओर बढ़ रहा है। धूल और खुले आसमान के नीचे बैठी महिलाओं का कहना है कि इतने दिनों के बावजूद न तो नगर निगम के अधिकारी हाल जानने पहुंचे और न ही प्रशासन की ओर से कोई ठोस पहल दिखाई दी। ऐसे में प्रभावित परिवारों की निगाहें अब छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय पर टिकी हैं, जहां से उन्हें राहत और न्याय की उम्मीद है।
130 परिवारों के बेघर होने का दावा
धरना स्थल पर मौजूद जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि लिंगियाडीह क्षेत्र के करीब 130 परिवारों के आशियाने पर संकट मंडरा रहा है। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि किसी भी कार्रवाई से पहले समुचित पुनर्वास (री-लोकेशन) किया जाए और परिवारों को आवासीय पट्टा दिया जाए। उनका आरोप है कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था के बेदखली की तैयारी ने गरीब परिवारों को असुरक्षा में डाल दिया है।
जनप्रतिनिधियों और महिलाओं का समर्थन
वार्ड पार्षद दिलीप पाटिल के अनुसार, चांठी जी सिंह राजपारा समिति समेत विभिन्न इलाकों की महिलाओं ने आंदोलन स्थल पहुंचकर समर्थन दिया। महिला समूहों ने कहा कि वे धरने पर बैठी महिलाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं।
राजनीतिक दलों का खुला समर्थन
आंदोलन को कांग्रेस, बसपा, कम्युनिस्ट पार्टी, आम आदमी पार्टी, छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना और जन चेतना पार्टी सहित कई दलों का समर्थन मिल रहा है। नेताओं ने मंच से कहा कि प्रभावित परिवारों के साथ न्याय होना चाहिए और पहले व्यवस्थापन के साथ आवास पट्टा दिया जाए।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं — भूपेश बघेल, अटल श्रीवास्तव और दिलीप लहरिया — समेत प्रदेश और जिला स्तर के पदाधिकारी धरना स्थल पहुंचकर समर्थन दे चुके हैं। मंच से नेताओं ने प्रदेश की व्यवस्था पर गरीबों के हितों की अनदेखी के आरोप लगाए और नगर निगम पर दबाव में काम करने की बात कही।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
धरना दे रहे परिवारों का कहना है कि 97 दिन बीत जाने के बाद भी नगर निगम और प्रशासन की ओर से संवाद की कोई पहल नहीं हुई। उनका आरोप है कि अधिकारी-कर्मचारी सुध लेने तक नहीं पहुंचे, जिससे आक्रोश बढ़ रहा है।
सामाजिक संगठनों की भागीदारी
स्वैच्छिक संगठनों और महिला समूहों की मौजूदगी ने आंदोलन को सामाजिक समर्थन दिया है। बड़ी संख्या में लोग धरना स्थल पहुंचकर समर्थन दर्ज करा रहे हैं। वक्ताओं का कहना है कि यह केवल लिंगियाडीह का मुद्दा नहीं, बल्कि शहर के गरीब तबके के अधिकारों से जुड़ा सवाल है।
हाईकोर्ट से राहत की आस
धरना स्थल पर बार-बार कहा जा रहा है कि अंतिम उम्मीद न्यायालय से है और बिना पुनर्वास किसी भी कार्रवाई पर रोक की मांग की जा रही है। आंदोलनकारियों का मानना है कि अदालत से उन्हें राहत मिलेगी।